पातंजल योग सूत्र, पतञ्जलि (पतंजलि) योग सूत्र योग
पातंजल योग सूत्र, पतञ्जलि (पतंजलि) योग सूत्रयोग - चैप्टर 01
योग का अर्थ
प्रिय विद्यार्थियो योग शब्द का विचार करने पर
यह तथ्य सामने आता है, कि योग शब्द संस्कृत के 'युज' धातु से बना है, जिसका
अर्थ होता है, जोड़ना अर्थात् किसी भी वस्तु से अपने
को जोड़ना या किसी कार्य में स्वयं को लगाना । पाणिनिगण पाठ का विस्तृत अध्ययन
करें तो उसमें तीन 'युज' धातु हैं ।
(क) युज समाधौ- दिवादिगणीय,
(ख) युजिर योगे- रुधादिगणीय,
(ग)
युजसंयमने-चुरादिगणीय,
(क) युज समाधौ– दिवादिगणीय
दिवादीगणीय युज धातु का
अर्थ है, समाधि । समाधि का प्रकृति प्रत्यय अर्थ
है। सम्यक स्थापन अर्थात् जब प्रगाढ़ संयोग सुषुम्ना में स्थिर ब्रहमनाड़ी से होता
है। वह स्थिति समाधि की होती है। दूसरे अर्थ में युज समाधौ का अर्थ है - समाधि की
सिद्धि के लिए जुड़ना या समाधि की प्राप्ति के लिए जो भी साधनायें शास्त्रों में
बताई गयी हैं, उन साधनाओ को अपने जीवन में अपनाना ही
योग का पहला अर्थ है।
(ख) युजिर योगे- रुधादिगणीय
रुधादिगणीय युज धातु का अर्थ है, जुड़ना, जोडना, मिलना, मेल करना । युजिर योगे का अर्थ है, संयोग करना । अर्थात् इस दुःख रुप संसार से वियोग तथा ईश्वर से संयोग
का नाम ही योग है। जिसका वर्णन श्रीमदभगवद्गीता में इस प्रकार किया गया है -
'तं विद्याद् दुःख संयोग वियोग योग संज्ञितम् ।' गीता 6 / 23
अर्थात् इस दुख रुपी संसार के संयोग से रहित होने का नाम ही योग है। वह साधन जिसके द्वारा परमात्मा के साथ ज्ञानपूर्वक संयोग है, जीवात्मा का । इस प्रकार योग का अर्थ जीवात्मा का परमात्मा के साथ संयोग हैं।
(ग) युजसंयमने-चुरादिगणीय
- चुरादिगणीय युज् धातु का अर्थ है, संयमन् अर्थात मन का संयम या मन का नियमन । इस प्रकार युज् संयमने का अर्थ है, मन का नियमन करना ही योग है। मन को संयमित करना ही योग है, तथा यह मन को नियन्त्रित करने की विद्या योग ही है। इस प्रकार योग का अर्थ योग साधनाओं को अपनाते हुए मन को नियन्त्रित कर, संयमित कर, आत्मा का परमात्मा से मिलन ही योग है।
योग की परिभाषाएं Definition of Yoga
योग का भारतीय जीवन पद्धति में अपना महत्वपूर्ण स्थान है। भारतीय ग्रन्थों में अनेक स्थानो पर योग विद्या का वर्णन मिलता है। योग विद्या का वर्णन वेद, पुराण, उपनिषद, गीता आदि प्राचीन ग्रन्थो में देखने को मिलता है। वेदो का प्रतिपाद्य विषय आध्यात्मि उन्नति है। वेदो में योग की विविध परिभाषाए निम्न प्रकार से है।
1 वेद के अनुसार योग की परिभाषा
वेदो में ईश्वरीय कृपा द्वारा ऋतम्भरा प्रज्ञा का वर्णन किया है
"स द्या नो योग आभुवत् स राये स पुर धयाम्
गमद् वाजगिरा स नः।।" - ऋ01 /5 / 3, साम0 1 / 2 / 311
अर्थात् ईश्वर की कृपा से हमें योग (समाधि)
सिद्ध होकर विवेक ख्याति तथा ऋतम्भरा – प्रज्ञा
प्राप्त हो, और वही ईश्वर हमे अपनी सिद्धियो (अणिमा
महिमा) सहित प्राप्त हो । वेद में इसी कारण प्रार्थना की गयी है -
'योगे - योगे तवस्तर वाजे वाजे हवामहे ।
सखाय इन्द्र मूतये ।' - ऋ01/30/7/11, शुक्ल यजु0 1 / 14
अर्थात् साधक योग प्राप्ति के लिए तथा विघ्नो में परम् ऐश्वर्यवान इन्द्र का आह्वान करते है। योग साधना में उत्पन्न विघ्नो को दूर करने की सामर्थ्य ईश्वर में है। अतः ईश्वर की महत्ता का वर्णन किया गया है। वेदो का मुख्य विषय आध्यात्मिक उन्नति करना है। इसके लिए यज्ञ, उपासना व कर्मकाण्ड का वर्णन किया गया है, तथा योग साधना पर विशेष बल दिया गया है। इस सन्दर्भ में ऋग्वेद में वर्णन इस प्रकार है-
"यस्मादृते न सिध्यति यज्ञो विश्चितश्चन।
स धीनां योगमिनवति ।।" ऋग्वेद1 / 18 / 7
अर्थात् विद्वानो का कोई भी कर्म योग के बिना
पूर्ण नही होता है। इस मन्त्र में से वेदो में योग की महत्ता वर्णित होती है। वेदो
में हठयोग का वर्णन भी मिलता है, तथा
उसके अंगो का वर्णन भी प्राप्त होता है -
“अष्ठचक नवद्वारा देवानां पूरयोधया ।
तस्यां हिरण्यमयः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः ।।” अथर्ववेद 10/1/31
अर्थात् मनुष्य शरीर आठ चक्र व नव द्वारो से
युक्त एक देवनगरी है। यह अपराजेय देव नगरी, इसमे
हिरण्यमय कोश है, जो एक दिव्य ज्योति और आनन्द से
परिपूर्ण हैं।
वेदो में आत्मा परमात्मा के साथ एक्य का वर्णन है। उसके लिए साधक की अभिलाषा निम्न मन्त्र में स्पष्ट होती है
"यदग्ने स्यमहं त्वं वा धा स्या अहम्
स्युष्टे सत्या दूहाशिषः ।।” ऋग्वेद 8 / 44 / 23
अर्थात् हे अग्नि देव ! अर्थात् मैं सर्व
समृद्धि सम्पन्न हो जाऊँ,
तेरे आर्शीवाद से ही मेरे सभी कार्य
सत्य सिद्ध हो जाए व तेरा मेरा एक हो जाये । अर्थात मैं - तू और तू-मैं हो जाए।
संक्षेप में यदि कहा जाए तो वेदो मे योग का वर्णन अनेक स्थानो पर मिलता है, तथा चित्त को एकाग्र करने की विद्या
(योग) मन्त्र दृष्टा ऋषियो को ज्ञात थी जिसके द्वारा उन्होने ईश्वर का साक्षात्कार
किया।
2 उपनिषद के अनुसार योग की परिभाषा
आध्यात्मिक ग्रन्थो में उपनिषद का स्थान सर्वोपरि रहा है। वैदिक शिक्षा का विस्तृत वर्णन उपनिषदो में किया गया है। योग विद्या का बहुत अधिक वर्णन उपनिषदो में मिलता है। उपनिषदों में योग की अनेक परिभाषाए दी गयी है।
कठोपनिषद में योग की परिभाषा निम्न है -
"यदा पंचावतिष्ठनते ज्ञानानि मनसा सह
बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ।।” 3/10 कठो०
अर्थात् योगाभ्यास करते करते पाँचो इन्द्रियॉ व
मन स्थिर हो जाए और बुद्धि भी परमात्मा के स्वरूप में स्थिर हो जाए, उस स्थिति में उसको परमात्मा के
अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु का ज्ञान या चेष्टा नही रहती है। उस स्थिति को योगीगण
परमगति, योग की सर्वोच्च अवस्था बतलाते है।
"तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभावाप्ययौ ।" 3/11 कठो०
अर्थात् "मन बुद्धि इन्द्रिय की स्थिर
धारणा का नाम ही योग है। इस योग को प्राप्त साधक विषयो व प्रमाद से सर्वदा रहित हो
जाता है। परमात्मा को प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले साधक के लिए कठोपनिषद में
कहा गया है कि साधक निरन्तर योग युक्त रहने का दृढ़ अभ्यास करते रहना चाहिए।
"नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा
अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र
कथं तदुपलभ्यते ।।"
अर्थात् वह परमात्मा कर्मन्द्रियो से ज्ञानेन्द्रियो से तथा मन, बुद्धि, अहंकार से भी प्राप्त नहीं किया जा सकता है। क्योकि वह इन सभी की पहुॅच से परे है। तथा वह योगाभ्यास द्वारा मन व इन्द्रियों को नियन्त्रित कर साधक को अवश्य मिलता है। अतः ईश्वर प्राप्ति के लिए दृढतम निश्चय के साथ प्रयत्नशील रहना चाहिए।
योग शिखोपनिषद के अनुसार -
""योऽपान प्राणयोऐक्यं स्थरजो रेतसोस्तथा ।
सूर्य चन्द्रसोर्योगाद् जीवात्मा परमात्मनो ।।
एवं तु द्वन्द्व जालस्य संयोगो योग उच्यते ।।"
अर्थात् प्राण और अपान की एकता सतरज रूपी कुण्डलिनी की शक्ति और स्वरेत रूपी आत्म तत्व का मिलन, सूर्य स्वर व चन्द्र स्वर का मिलन एवं जीवात्मा व परमात्मा का मिलन ही योग है।
श्वेताश्वतर उपनिषद में योगाभ्यास के लिए
उपयुक्त स्थान का वर्णन करते हुए कहा गया है -
"समे शुचौ शर्करा वहिन बालुका
विवर्जिते शब्द जलाश्रयादिभिः ।
मनोऽनुकुले न क चक्षुपीड़ने
गुहृय निवाता श्रयणे प्रयोजयेत् ।।" 12/10
अर्थात् योगाभ्यास के लिए समतलसुचि समतल कंकर पत्थर रहित आग व बालू से रहित तथा शब्द जलादि का व्यवधान न हो। जहाँ आँखो को पीड़ा देने वाली वस्तु ना हो, प्रिय लगने वाला स्थान हो। ऐसा स्थान ही योगाभ्यास के लिए उपयुक्त स्थान होता है, तथा ऐसे स्थान पर योग सिद्धि अवश्य प्राप्त होती है।
योग शिखोपनिषद में योग के प्रकारो
की चर्चा इस प्रकार से है -
"मन्त्रो लयो हठो राजयोगान्ता भूमिकाः कमात्
एक एव चतुर्धाऽयं
महायोगाऽभिधीयते ।।"
अर्थात् मन्त्रयोग, लययोग, हठयोग और राजयोग ये चारो योग की चार पद्धतियाँ है। चारो मिलकर चतुर्विध योग कहलाते है, जिसे महायोग कहते है। उपनिषदों में मोक्ष प्राप्ति के लिए ज्ञान का होना आवश्यक हैं। ज्ञान के साथ का ज्ञान होना आवश्यक है।
योग तत्वोपनिषद में कहा गया है - साथ योग
"योग हीनं कथंज्ञानं मोक्षदं भवति ध्रुवम्
योगोऽपि ज्ञान हीनस्तु न
क्षमों मोक्षकर्मणि ।।"
अर्थात योग के बिना ज्ञान ध्रुव मोक्ष देने वाला नहीं हो सकता है, तथा ज्ञानहीन योग भी मोक्ष कर्म में असमर्थ है। अतः मोक्ष की प्राप्ति के लिए योग का ज्ञान आवश्यक हैं।
अमृतनादो उपनिषद में योग के अंगो का वर्णन करते हुए कहा गया है-
"प्रत्याहारस्तथा ध्यानं प्राणायामौऽय धारणा
तर्कश्चैव समाधिश्च षडंगोयोग उच्यते ।।"
अर्थात् प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, प्राणायाम, तर्क और समाधि यह षडंग योग कहलाता है।
श्वेताश्वतर उपनिषद में योग के फल का वर्णन इस प्रकार किया गया है
"लघुत्वमारोग्यं मलोलुपत्वं वर्ण प्रसाद स्वर सौष्ठवं च ।
गन्धाः शुभो मूत्रपुरीषमल्यं योग प्रवृत्रिं प्रथमा वदन्ति ।।" 2/13
अर्थात् योग के सिद्ध हो जाने पर शरीर हल्का हो जाता है, शरीर निरोग हो जाता है। मनुष्य को किसी भी विषयो के प्रति राग नही रहता है। योगी का शरीर आकर्षक हो जाता है। स्वर मधुर, शरीर की दिव्य गन्ध व शरीर में मल मूत्र की कमी हो जाती है।
श्वेताश्वतर उपनिषद में योग के फल का वर्णन करते हुए कहा गया है
"न तस्य रोगो न जरा न मृत्यु
प्राप्तस्य योगाग्नमयं शरीरम् ।।”2/12
मैत्रायण्युपनिषद में कहा गया है-
"एकत्वं प्राणनसोरिन्द्रियाणां तथैव च
सर्वभाव परित्यागो योग इत्यभिधीयते ।।" 6/25
अर्थात् मन, प्राण व इन्द्रियों का एक हो जाना, एकाग्र अवस्था को प्राप्त कर लेना, बाहय विषयों से विमुख होकर इन्द्रियों का मन में और मन का आत्मा में लग जाना, प्राण का निश्चल हो जाना योग है।
3 पुराणो के अनुसार योग की परिभाषा
पुराणो मे योग का वर्णन मिलता है। पुराणो की रचना महर्षि वेदव्यास द्वारा की गयी है। पुराणो की संख्या 18 बतायी गयी है।
शिव पुराण में योग को इस प्रकार परिभाषित किया गया है-
"निरूद्ध वृत्पतरस्य शिवे चितस्य निश्चला।
या वृत्तिः सा समासेन योगः स खलु पंचधा ।।” 21 वॉ अ
अर्थात् शिव में अपने अन्तःकरण की समस्त वृत्तियों को निश्चय रूप से लगा देने का नाम ही योग है।
शिव पुराण में अष्टांग योग का वर्णन इस प्रकार से है -
"अष्टांगो वा षंडगों वा सर्वयोगः समासतः
यमश्च नियमश्चैव स्वस्ति काधां तथासनम् ।।
प्राणायाम प्रत्याहारो धारणा ध्यानमेव च ।
समाधिरिति
योगांगान्याष्टावुक्तानि सुरिभिः ।।"
अर्थात् योग के आठ व छः अंग है। आठ अंग इस प्रकार से है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
अग्नि पुराण के अनुसार -
अग्नि पुराण के द्वितीय खण्ड में अष्टांग योग
का वर्णन मिलता है, तथा योग को निम्न प्रकार से परिभाषित
किया गया है।-
"ब्रहम प्रकाशकं ज्ञान योगस्तत्रैकचित्तता।
चित्त वृत्ति निरोधाश्च जीव ब्रहमात्मनो ।।" अग्नि पुराण 183 / 1-2
अर्थात् ब्रहम में चित्त की एकाग्रता ही योग है।
मत्स्य पुराण के अनुसार योग की परिभाषा -
“कर्मयोग से उत्पन्न ज्ञान के द्वारा परम पद (समाधि) की प्राप्ति होती है।"
ब्रहम पुराण के अनुसार योग की परिभाषा -
ब्रहम पुराण में योग के अभ्यास कैसे किये जाए इसका वर्णन किया गया है।
व्यास जी के अनुसार योग की परिभाषा -
बहुत समय तक एक ही समय में
आहार ग्रहण करने वाला विशुद्ध - आत्मा से युक्त योगी बल की प्राप्ति किया करते है।
तथा काम, क्रोध, शीतउष्ण आदि सभी प्रकार के द्वन्दो, विषयो को जीतकर धारणा, ध्यान, समाधि का सतत् अभ्यास कर समाधि की
सिद्धि प्राप्त करते हैं।
श्रीमद्भगवद् पुराण के अनुसार योग
श्रीमद्भगवद् पुराण में भी अनेक जगह योग का वर्णन किया गया है "योग द्वारा इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि का नियमन ही योग है।" 2/1/18
विष्णु पुराण के अनुसार योग
विष्णु पुराण में यम, नियम का वर्णन इस प्रकार से किया गया है
"ब्रहमचर्यमंहिसां..........कामे निष्कामाणां विमुक्तिदा ।।" वि० पु० 6/7 / 36-38
अर्थात् अपने मन को निष्काम भाव से योगी ब्रहमचर्य, अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह में लगाये, तथा मन का निग्रह का योगी स्वाध्याय, शौच, सन्तोष तथा तप करे, और ईश्वर प्रणिधान द्वारा मन को ईश्वर में लगाये। यम, नियमो का अभ्यास सकाम भाव से किये जाने पर विशेष बल देते है, तथा निष्काम भाव से विमुक्ति इस प्रकार "यम, नियमादि का निष्काम भाव से पालन कर विमुक्ति प्राप्त करना ही योग है।" ........
पुराण में भक्ति योग की महत्ता का वर्णन
इस प्रकार से किया गया है -
"न युज्यमान यत् भक्त्या भगवत्यखिलात्मनि ।
सहशोऽस्ति शिवो पन्थाः योगीनां ब्रहमसिद्धये ।।" भगवद पुराण 3 / 25/9
अर्थात् ब्रहम प्राप्ति हेतु अखिल आत्म स्वरूप भगवान में कि की गयी भक्ति श्रेष्ठ है। यह भक्ति योग शिव के समान कल्याणकारी मार्ग है।