संवेग एवं व्यक्तित्व
विकास के सिद्धान्त (Emotion and Theory of Personality Development)
बाल्यावस्था के प्रमुख संवेग (Some Childhood Emotions)
लगभग तीन माह की अवस्था
से ही बालक में विभिन्न प्रकार के संवेग विकसित होने प्रारम्भ हो जाते हैं, जिनका विकास आयु
बढ़ने के साथ-साथ होता जाता है। इन संवेगों से सम्बन्धित बालो में कुछ संवेगात्मक
प्रतिमान पाये जाते हैं। वालकों के कुछ प्रमुख संवेगों का वर्णन निम्न प्रकार से
हैं-
1. भय (Fear)
- भय वह आन्तरिक अनुभूति है, जिसमें प्राणी किसी खतरनाक परिस्थिति से दूर भागने का प्रयास करता है। भय की अवस्था में बालकों में रोने, चिल्लाने, काँपने, रोंगटे खड़े होने, साँस और हृदय की धड़कन मन्द होने तथा रक्तचाप बढ़ जाने जैसे लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। अध्ययनों में देखा गया है कि बालक की बौद्धिक योग्यताओं के विकास के साथ-साथ उसमें भय की तीव्रता तो बढ़ती ही है बल्कि वह अपेक्षाकृत अधिक चीजों से भय खाने लगता है।
- बचपन में अधिकांश बालक जानवरों, अँधेरे स्थान, ऊँचे स्थान, अकेलेपन, पीड़ा, अनजान व्यक्तियों और वस्तुओं, तीव्र ध्वनि और अचानक उन्हें गलत तरीके से उठा लेने पर डरते हैं। वाल्यावस्था में बालकों के भय उद्दीपकों की संख्या बढ़ जाती है, साथ ही साथ भय की तीव्रता भी बढ़ जाती है। दो वर्ष की अवस्था से छः वर्ष की अवस्था तक भय संवेगों का विकास सामान्यतः चरम सीमा तक पहुँच जाता है। अधिक बड़े बच्चों में काल्पनिक भय, मृत्यु का भय, चोट लग जाने का भय आदि भी विकसित होने लगते हैं। वयः सन्धि अवस्था तक बालक को अपने स्वयं की प्रतिष्ठा और स्तर का भय लगने लगता है। बालकों में भय अचानक उत्पन्न होता है।
- बालक में सामाजिक भावना के विकास के साथ-साथ भय का क्षेत्र भी बढ़ जाता है। बड़ों की स्वीकृति और अस्वीकृति भी बालक में भय के विकास का कारण बन जाता है। वह किसी कार्य की असफलता के ऊपर अत्यन्त चिन्तित होता और सोचता है-कहीं अभिभावकों को पता न हो जाए। वह सब भय को जन्म देने वाले और बालकों में भय की मनोवृत्ति को बढ़ाने वाले होते हैं। वह बड़ों से डरने लगता है। किशोरावस्था, प्रौढ़ावस्था तथा वृद्धावस्था में लिंग से सम्बन्धित भय विकसित होता है। प्रौढ़ावस्था में बालक उन सब वस्तुओं के प्रति भयभीत होने लगता है जो बुढ़ाने में उसे अशक्त और अयोग्य बना देगी।
2. आत्म गौरव (Self Assertion)
- प्रत्येक व्यक्ति में आत्म गौरव की भावना होती है। इस मूल प्रवृत्ति के साथ संवेग जुड़ा रहता है। बालक अपने महत्व को प्रकट करने के लिए दूसरों का ध्यान अपनी ओर केन्द्रित करना चाहता है। बाहर जाने के लिए बालक अच्छे कपड़े पहनने की जिद करता है। इस प्रवृत्ति से प्रत्येक व्यक्ति प्रभावित होता है। हमारे प्रत्येक कार्य में आत्म-गौरव का भाव निहित होता है।
- बालकों की शिक्षा के लिए इस मूल प्रवृत्ति का अत्यन्त महत्व होता है। बालक में ऐसी आदतों, संस्कारों का विकास होना चाहिए, जो उसके सामाजिक तथा वैयक्तिक जीवन को प्रभावित कर सकें। यह प्रवृत्ति बालक के भविष्य का निर्माण करती है। यदि आत्म प्रदर्शन की भावना का दमन किया जाता है तो बालक में आत्महीनता की भावना उत्पन्न हो जायेगी और उसमें दीनता, हीनता आदि से उसके व्यक्तित्व तथा चरित्र का विकास रुक जाएगा। वह अनैतिक तथा समाज विरोधी कार्यों में संलग्न हो जायेगा।
3. चिन्ता (Anxiety)
- चिन्ता व्यक्ति की वह कष्टप्रद मानसिक स्थिति है, जिसमें वह भविष्य की विपत्तियों की आशंकाओं से व्याकुल रहता है। यद्यपि यह भय और परेशानी से ही विकसित होती है, परन्तु यह चिन्ता भिन्न इसलिए है कि यह वर्तमान परिस्थिति और उद्दीपक के सम्बन्ध में न होकर पूर्वानुमानित उद्दीपक के सम्बन्ध में होती है। इसका विकास भय संवेग के विकास के बाद प्रारम्भ होता है क्योंकि यह बालक में उस समय उत्पन्न होती है, जब उसमें कल्पना का विकास प्रारम्भ हो जाता है, यह बालकों में उस आयु में प्रारम्भ होती है, जब वह स्कूल जाना प्रारम्भ करते हैं। इसका विकास बाल्यावस्था में होता रहता है। यह वयः सन्धि अवस्था में अति तीव्र हो जाती है।
- चिन्ता हृदयगत छिपी हुई परेशानी के प्रति मस्तिष्क की प्रतिक्रिया होती है। चिन्ता में आशंका विषमीगत होता है। कुछ मनोवैज्ञानिकों के विचार से चिन्ता में व्यक्ति अपनी अन्तर्दशा और तद्धन्य विचारों को बाह्य पदार्थों की परिस्थितियों में प्रशिप्त रूप से देखता है। इसे दुर्भीति कहते हैं। उदाहरण के लिए, प्रेत, भूतात्मा या लाश का भय अथवा किसी ऐसी भयप्रद पूर्व घटना जो वर्तमान में उसे हानि नहीं पहुँचा सकती अथवा ऐसी कोई परिस्थिति पैदा नहीं कर सकती, जो व्यक्ति के लिए भय का कारण बने। ये इस प्रकार के भय हैं, जो आन्तरिक कारणों से उत्पन्न होते हैं और किसी बाह्य घटना के प्रतीक स्वरूप भय उत्पादन करने वाले बन जाते हैं। कोई भी व्यक्ति सरलतापूर्वक इस चिन्ता की व्याकुलता से मुक्त हो सकता है, यदि वह अपने मन की अन्तर्दशाओं का सामना करना सीख ले।
4. जिज्ञासा (Curiosity)
- जिज्ञासा ही समस्त ज्ञान की जननी है। बालक में प्रत्येक उस वस्तु के विषय में जानने की इच्छा होती है, जिसके विषय में वह कुछ नहीं जानता है। जिज्ञासा के साथ आश्चर्य का. संवेग जुड़ा रहता है। बालक में प्रारम्भ से ही जिज्ञासा होती है और इसी जिज्ञासा के कारण वह ज्ञान अर्जित करता है। बड़े होने पर भी यह मूल प्रवृत्ति विद्यमान रहती है। अभिभावकों का दायित्व है कि ये बालक की जिज्ञासाओं को शान्त करें तथा उनमें किसी प्रकार की भावना ग्रन्थियाँ न बनने दें। यदि वे बालक की जिज्ञासाओं को शान्त नहीं करेंगे तो बालक सीखने की क्रिया के प्रति उदासीन हो जायेंगे।
- जिज्ञासा की प्रवृत्ति का शारीरिक महत्त्व भी होता है। इससे शरीर भय तथा पीड़ा जैसे स्थलों से परिचित हो जाता है जिन चीजों से सन्तोष मिलता है, उसके प्रति जिज्ञासा की वृद्धि होती जाती है। इस प्रवृत्ति के कारण बालकों में वातावरण के प्रति समायोजन की क्षमता विकसित होती जाती है।
- जिज्ञासा बालक के जीवन को सुखात्मक रूप से उद्दीप्त ही नहीं करती है, बल्कि यह बालक को नए अर्थों को सीखने और अन्वेषण करने के लिए भी प्रेरित करती है। जिज्ञासा बालक के लिए उत्तेजना का कार्य करती है। यदि इसको बालकों में नियन्त्रित न किया जाए तो वह बालकों के लिए हानिकारक और खतरनाक हो सकती है। वह दियासलाई या बिजली के खेल खेलकर अपने को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
5. ईर्ष्या (Jealousy)
- ईर्ष्या के मूल में अप्रसन्नता होती है और इसकी उत्पत्ति क्रोध से होती है। अक्सर देखा गया है कि जब एक बच्चे के माता-पिता उसे स्नेह न देकर दूसरे बच्चों को देते हैं तो वालक में ईर्ष्या उत्पन्न होने लगती है। नवजात शिशु के आगमन पर इस शिशु के भाई-बहिनों में इसके आगमन के कारण ईर्ष्या उत्पन्न हो सकती है। लगभग डेढ़ वर्ष की अवस्था में ईर्ष्या का अंकुरण बालक में प्रारम्भ हो जाता है। अध्ययनों में यह देखा गया है कि लड़कों की अपेक्षा लड़कियों में ईर्ष्या अधिक होती है। अन्य अवस्था की अपेक्षा ईर्ष्या की मात्रा तीन-चार वर्ष की अवस्था में अधिक होती है। अधिक घुद्धि वाले लोगों में ईर्ष्या अपेक्षाकृत अधिक होती है। अन्य बच्चों की अपेक्षा सबसे बड़े बच्चे में ईर्ष्या अधिक होती है। छोटे परिवारों के बच्चों में ईर्ष्या अपेक्षाकृत अधिक होती है। ईर्ष्या के कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार से हैं- नवजात शिशु का उत्पन्न होना, भाई-बहिनों में अधिक अन्तर होना, संरक्षकों में पक्षपात की भावना का होना, माता-पिता की अभिवृत्ति आदि। ईर्ष्या को नियन्त्रित या कम करने के उपाय निम्नलिखित हैं बच्चों को नकारात्मक आदेश न दिए जाएँ, माता-पिता सभी बच्चों के साथ समान व्यवहार करें, चिढ़ाया न जाए, तंग न किया जाए, दिनचर्या को मनोरंजक बनाया जाए।
6. शर्मीलापन (Shyness)
- शर्म एक प्रकार का भय ही है, जिसमें व्यक्ति दूसरों के सम्पर्क में आने और परिचय प्राप्त करने में झिझकता या कतराता है। शर्म व्यक्तियों से ही होती है, वस्तुओं और परिस्थितियों से नहीं होती है। बहुधा बच्चे उन बच्चों या व्यक्तियों से शर्म करते हैं, जो उनके लिए अपरिचित होते हैं या शर्म करने वाले से अधिक शक्ति या विशेषताओं वाले होते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि बालक एक समय में एक व्यक्ति से शर्म करे, वह एक समय में एक व्यक्ति या अधिक व्यक्तियों से शर्म कर सकता है। अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि वालकों में शर्म की अभिव्यक्ति वैसे-वैसे कम होती जाती है, जैसे-जैसे वे अधिक और अधिक व्यक्तियों के सम्पर्क में आते जाते हैं। उनकी शर्म की आवृत्ति और तीव्रता, दोनों ही कम होती जाती हैं। यह संवेग बालकों के सामाजिक सम्बन्धों को भी दुर्वल बनाता है। बच्चे बहुधा अपने घर आने वाले मेहमानों, अध्यापकों से शर्म करते हैं या किसी समूह या किसी के सामने बोलने, बातचीत करने और गाना आदि सुनाने से शर्माते हैं। छोटा बच्चा शर्म के मारे अनजान व्यक्ति से दूर भागकर परिचित के पास छुप सकता है। अधिक बड़ा बच्चा शर्म के मारे तुतला या हकला सकता है, कम बात कर सकता है या शर्म के मारे उसका चेहरा लाल हो सकता है।
7. आनन्द एवं सुख (Joy and Pleasure)
- आनन्द का संवेग किसी बात या वस्तु से सुख की प्राप्ति करना है, आनन्द की अनुभूति करने वाला व्यक्ति उस स्थिति को हमेशा बनाये रखना चाहता है। मुस्कराने तथा उन्मुक्त हँसी द्वारा आनन्द संवेग की अभिव्यक्ति होती है।
- वे परिस्थितियाँ, जिनमें व्यक्ति को आनन्द की अनुभूति होती है, आयु के साथ-साथ भिन्न होती जाती हैं। शिशुओं में भौतिक वस्तुओं को प्राप्त करने के पश्चात् हर्ष तथा आनन्द उत्पन्न होता है। वे कू-कू करते हैं, हाथ-पैर फेंकते हैं और आगे खिसकने का प्रयास करते हैं। चार-पाँच वर्ष के बालकों पर प्रसन्नता की परिस्थितियों का प्रभाव भिन्न होता है। जब कोई बालक अनेक प्रकार के नए कार्य करते हैं और उसमें उसे सफलता मिलती है तो वह आनन्द अनुभव करता है। बड़े बच्चे रिस्क वाले कार्यों में सफलता प्राप्त करके प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।
- प्रसन्नता का संवेग मुस्कराहट तथा खिलखिलाहट से व्यक्त होता है। इनसे सम्पूर्ण शरीर को आराम मिलता है। आयु वृद्धि के साथ-साथ बच्चों में मुस्कराहट तथा खिलखिलाहट की क्रिया बढ़ती जाती है। मुस्कराने तथा हँसने में भी अनेकों भाव निहित होते हैं। यह भी देखा गया है कि आनन्द की अनुभूति से शरीर के अंग हिलने लगते हैं।
- आनन्द तथा हर्ष की अनुभूति सामाजिक सम्पर्क से भी होती है। बालक साथियों के सम्पर्क से क्रिया-प्रतिक्रिया करता है तथा आनन्द अनुभव करता है।
8. परेशानी (Worry)
- परेशानी एक प्रकार का काल्पनिक भय है, जो बालक के स्वयं के मन की उपज होता है। यह वह अधिक बढ़ा-चढ़ा हुआ भय है, जो गलत तर्क पर आधारित होता है। परेशानी महसूस करना बालक उस समय से प्रारम्भ कर सकते हैं, जब उनमें कल्पना और बौद्धिक योग्यताओं का विकास पर्याप्त मात्रा में हो जाता है। यही कारण है कि उसका विकास लगभग तीन वर्ष की अवस्था से प्रारम्भ होता है। सम्पूर्ण बाल्यावस्था में इसका विकास होता रहता है और वयःसन्धि अवस्था तक यह संवेग चरम सीमा तक पहुँच जाता है। इस अवस्था के बाद बौद्धिक क्षमताओं का तथा तर्क का विकास अपनी चरम सीमा की ओर बढ़ने से उनके इस संवेग की तीव्रता और आवृत्ति, दोनों ही कम हो जाती हैं। बहुधा बच्चे जब भय उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों का वर्णन सुनते हैं या टेलीविजन और फिल्मों आदि में देखते हैं तब उनमें उस संवेग का उत्पन्न होना कल्पना के आधार पर स्वाभाविक हो जाता है।
9. स्नेह (Affection)
- प्रेम या स्नेह व्यक्ति की वह आन्तरिक अनुभूति है जिसकी उपस्थिति में व्यक्ति दूसरे व्यक्ति या वस्तुओं की ओर आकर्षित होता है और उन्हें देखकर सुख और सन्तोष का अनुभव करता है। बच्चा माँ को देखकर लगभग तीन महीने की अवस्था में ही मुस्कुराना प्रारम्भ कर देता है, परन्तु वास्तव में प्रेम का संवेग शुद्ध रूप से बच्चों में इस अवस्था में नहीं पाया जाता है। बच्चों का इस प्रकार से मुस्कुराना केवल एक सामान्य उद्दीप्तावस्था है। प्रेम की अवस्था में देखा गया है कि व्यक्ति के होठों पर कम्पन, प्रसन्नता, मुस्कुराहट, शरीर में सिरहन, वाणी मधुर और लयात्मक प्रतीत होती है। कई बार व्यक्ति अपने प्रेम उद्दीपक का आलिंगन, स्पर्श और चुम्बन भी करता है। अन्य संवेगों की अपेक्षा यह संवेग व्यक्ति के समायोजन और उसके व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण कारक है। लगभग छः महीने की अवस्था से बच्चों में प्रेम अंकुरित होने लगता है। सर्वप्रथम बालक में अपनी माँ के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है अथवा उस व्यक्ति के प्रति जो शैशवावस्था में उसका पालन-पोषण करता है। लगभग एक वर्ष की अवस्था से वह दूसरे व्यक्तियों और जानवरों के प्रति प्रेम का प्रदर्शन करने लग जाता है।
10. क्रोध (Anger)
- अन्य संवेगों की अपेक्षा यह संवेग अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में बालकों में पाया जाता है। सम्भवतः बालक को बहुत छुटपन में ही ज्ञात हो जाता है कि क्रोध एक प्रभावशाली तरीका है, जिसकी सहायता से ध्यान आकर्षित किया जा सकता है। भिन्न-भिन्न बालकों में इस संवेग की आवृत्ति और तीव्रता भिन्न-भिन्न होती है। क्रोध किसी भी व्यक्ति या वस्तु के प्रति हो सकता है। क्रोध में बालक आक्रामक व्यवहार अपनाता है। वालक आक्रामक व्यवहार में मारना, काटना, धूकना, धक्का देना, चुटकी काटना, झटका देकर खींचना आदि किसी प्रकार का व्यवहार अपना सकता है। क्रोध में वह अवरोधित व्यवहार अनुक्रिया भी अपना सकता है। जब बालक अपने क्रोध को नियन्त्रित कर लेता है या दवा लेता है तब वह अवरोधित अनुक्रियाएँ अपनाता है। इस प्रकार की अनुक्रियाओं में वह उदासीनता या तटस्थता का व्यवहार अपना सकता है। क्रोध में बालक आक्रामक व्यवहार अनपायेगा या अवरोधित व्यवहार अपनायेगा, यह निश्चित नहीं होता है। कई बार यह देखा गया है कि बालक जब संरक्षकों के भय के कारण घर पर क्रोध प्रदर्शित नहीं कर पाता है तो वह उनकी अनुपस्थिति में घर में, बाहर या स्कूल में अपना क्रोध प्रदर्शित करता है। क्रोध की व्यवहार अनुक्रियाओं में विचलन छोटे बच्चों की अपेक्षा बड़े बालकों में अधिक इसलिए पाया जाता है कि वह इन अनुक्रियाओं को अनुभव के आधार पर सीख चुके होते हैं।