एरिक्सन का मनोसामाजिक विकास का सिद्धान्त(Erikson's Theory of Psycho-Social development)
एरिक्सन का मनोसामाजिक विकास का सिद्धान्त
फ्रायड की तरह एरिक्सन भी मनोविश्लेषणवाद मनोवैज्ञानिक थे। एरिक्सन द्वारा मनोसामाजिक विकास सिद्धान्त का प्रतिपादन सन् 1950 में किया गया तथा इसमें सन् 1963 में उनके द्वारा संशोधन किया गया। एरिक्सन ने फ्रायड के सिद्धान्तों का समर्थन किया, लेकिन उन्होंने कामुकता को महत्वपूर्ण नहीं माना है। उनका यह मानना था कि विकास में जैविक कारकों की अपेक्षा सामाजिक कारकों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है। मनोसामाजिक विकास सिद्धान्त के आधार पर एरिक्सन यह मानते थे कि विकास का केन्द्रीय तथ्य यह है कि बालक में मनोलैंगिक विकास के साथ-साथ मनोसामाजिक विकास की प्रक्रिया भी चलती है। एरिक्सन का सिद्धान्त आठ अवस्थाओं में विभक्त है।
एरिक्सन के सिद्धान्त की अवधारणाएँ (Assumptions) -
इस सिद्धान्त की कुछ अवस्थाएँ या परिकल्पनाएँ निम्न प्रकार हैं-
(1) एरिक्सन की यह भी मान्यता है कि अहम् का सम्पूर्ण रूप बहुत शक्तिशाली है। उसने अहम् के अस्तित्व को तीन आयामों से समझाया है- (1) तथ्यात्मक, (2) यथार्थबोध और (3) वास्तविकता।
(2) एरिक्सन द्वारा प्रतिपादित व्यक्तित्व के मनोसामाजिक सिद्धान्त में निर्धारणता, वस्तुनिष्ठता, अग्रलक्ष्यता, विवेकपूर्णता और विषम स्थिति आदि को अपेक्षाकृत कम महत्व दिया गया।
(3) व्यक्तित्व विकास में अहम् का भी महत्वपूर्ण कार्य होता है। इड की सहायता से जीवन की वास्तविकताओं से व्यक्ति समझौता करके प्रौढ़ता की ओर अग्रसर होता है। एरिक्सन ने अहम् प्रत्यय का उपयोग व्यापक अर्थों में किया है। उसके सिद्धान्त में प्रयुक्त अहम् सृजनात्मक अहम् है।
(4) एरिक्सन द्वारा प्रतिपादित व्यक्तित्व के मनोसामाजिक सिद्धान्त में पूर्णतावाद, पर्यावरणीयता और परिवर्तनशीलता को महत्व दिया गया है।
(5) बच्चों के जीवन में जो सामाजिक अनुभूतियाँ समय-समय पर होती हैं, इन अनुभूतियों का व्यक्तित्व विकास में महत्त्वपूर्ण कार्य होता है। इन्हीं अनुभवों के आधार पर बच्चों में धनात्मक अथवा ऋणात्मक भावनाएँ उत्पन्न होती हैं और विकसित होती हैं। व्यक्तित्व की नींव यहीं से प्रारम्भ होती है।,
एरिक्सन के विकास के मनोसामाजिक सिद्धान्त की आठ विकासात्मक अवस्थाओं का विवरण निम्न प्रकार है-
(1) शैशवावस्था : विश्वास बनाम अविश्वास
- यह अवस्था जन्म से लेकर 2 वर्ष तक की अवस्था है। इस अवस्था के शिशु में अहम् का पहला धनात्मक गुण विश्वास की भावना का विकास है। विश्वास की भावना शिशु में तब उत्पन्न होती है, जब माँ शिशु की उत्तम ढंग से देखभाल करती है। जब एक माँ शिशु की अच्छे ढंग से देखभाल करती है, तब शिशु में दूसरे के प्रति विश्वास का विकास प्रारम्भ होता है। उसमें यह भी विश्वास विकसित होता है कि उसके शरीर के अंग उसकी जैविक आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम हैं। यहीं से व्यक्तित्व विकास का निर्माण प्रारम्भ होता है।
- जब शिशु की माँ बच्चों की देखभाल उत्तम ढंग से नहीं करती है, तब उनमें अविश्वास, अनुपयुक्तता और तिरस्कार की भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। इन भावनाओं के उत्पन्न होने से शिशु दूसरे व्यक्तियों से डरता है और दूसरे व्यक्तियों के प्रति उसमें सन्देह और आशंकाओं का विकास प्रारम्भ होता है। इस अवस्था में शिशु का जो व्यक्तित्व विकसित होता है, वह ऋणात्मक व्यक्तित्व होता है। जैसे-जैसे इस अवस्था के शिशु की माँ अपना ध्यान उससे हटाकर दूसरी वस्तुओं या व्यक्तियों की ओर लगाना प्रारम्भ करती है, उसमें अविश्वास की भावना बढ़ती और बढ़ती ही चली जाती है। इस अवस्था के शिशु के लिए विश्वास और अविश्वास दोनों ही सीखना आवश्यक होता है।
- एरिक्सन के अनुसार इस अवस्था के शिशु में जो कर्मकाण्डता पायी जाती है, उसे दिव्यतत्व कहते हैं। यह दिव्यतत्व इसलिए कहलाता है कि इस अवस्था का शिशु अपनी माँ को एक दिव्य शक्ति के रूप में जानता और पहचानता है। वयस्कावस्था में शिशु की यह कर्मकाण्डता स्नेह और आदर रूपी कर्मकाण्ड के रूप में अभिव्यक्त और विकसित होती है।
(2) प्रारम्भिक बाल्यावस्था : स्वायत्तता बनाम लज्जाशीलता
- यह अवस्था 3 वर्ष से लेकर 4 वर्ष तक की अवस्था है। जब शैशवावस्था में शिशु में विश्वासभाव विकसित हो जाता है, तब इस अवस्था में उसमें स्वायत्तता और आत्म-नियन्त्रण का भाव अथवा, शीलगुण विकसित होता है। इस अवस्था में उसमें माँसपेशीय परिपक्वता, सामाजिक विभेद और वाचिकता जैसी क्षमताएँ उत्पन्न और विकसित होती हैं, जिसके कारण वह स्वतन्त्रता से अपने चारों ओर के वातावरण में अन्वेषण प्रारम्भ कर देता है। इस अवस्था के बालक में गति कौशल भी विकसित होना प्रारम्भ होता है। इन गति कौशलों के विकास से बालक को प्रसन्नता ही नहीं प्रोत्साहन भी प्राप्त होता है। इस अवस्था का बालक अधिक से अधिक स्वयं काम करना चाहता है, इसी को स्वायत्तता कहा जाता है।
- जब इस अवस्था के बालक को माता-पिता बहुत छोटा समझकर कोई कार्य करने नहीं देते हैं, उसे अपने चारों ओर के वातावरण में स्वतन्त्रता से अन्वेषण करने नहीं देते हैं और अक्सर माता-पिता उसके कार्यों को स्वयं कर देते हैं, कई बार उसके माता-पिता इसलिए ऐसा
(3) खेल अवस्था: पहल करना बनाम दोषिता
- यह अवस्था 5 वर्ष से 6 वर्ष की अवस्था है। इस अवस्था का बालक अपने चारों ओर से सामाजिक संसार में सक्रियता और पहल शक्ति दिखाना प्रारम्भ कर देता है। वह दूसरों का कार्य आनन्द के साथ करता है। इस अवस्था के बच्चों में गति कौशलों का विकास काफी कुछ हो चुका होता है, उनकी भाषा भी काफी विकसित हो जाती है, इसलिए ये बच्चे घर से बाहर दूसरे बच्चों के साथ खेलना बहुत पसन्द करते हैं। मनोसामाजिक विकास की इस अवस्था में बच्चा ऐसा अनुभव करता है कि उसकी गिनती एक आदमी के रूप में हो रही है और उनके जीवन का भी एक विशेष उद्देश्य है।
- जब इस अवस्था के बालक को माता-पिता बाहर दूसरे बच्चों के साथ खेलने से रोकते है या कभी-कभी माता-पिता बच्चों को शाब्दिक या शारीरिक दण्ड देते हैं तो माता-पिता द्वारा ऐसा किए जाने से, बालक में दोषिता की भावनाएँ या व्यक्तित्व लक्षण उत्पन्न होने लग जाते हैं। इन बच्चों को जैसे-जैसे माता-पिता द्वारा रोका और दण्ड दिया जाता है। वैसे-वैसे उनमें दोषिता की भावना प्रबल और प्रवल होती चली जाती है। यह देखा गया है कि दोषिता भाव वाले बच्चों में अभिव्यक्ति करने की क्षमता कम हो जाती है, वे वास्तविक लक्ष्यों को प्राप्त करने में भी कतराते हैं। धीरे-धीरे उनके वास्तविक लक्ष्य प्राप्त करने की क्षमता कम होते-होते समाप्त हो जाती है। एरिक्सन का विचार है कि बच्चों में जब दोषिता भाव अधिक दिनों तक बना रहता है, तो उनमें निष्क्रियता, लैंगिक नपुंसकता तथा अन्य सामाजिक विकार से सम्बन्धित व्यवहार या प्रवृत्तियाँ विकसित होने लग जाती हैं।
(4) स्कूल अवस्था : परिश्रम बनाम हीनता
- यह अवस्था 7 वर्ष से लेकर 12 वर्ष तक की अवस्था है। इस अवस्था का बालक औपचारिक शिक्षा द्वारा समाज और संस्कृति के कुछ सरल और प्रारम्भिक कौशलों को सीखता है, जैसे-सम्बन्ध निगमनात्मक तर्क करने की योग्यता, आत्म-अनुशासन तथा सामाजिक अनुमोदन के नियमों आदि का अधिगम करता है। इस प्रकार के सामाजिक और सांस्कृतिक नियम. इस अवस्था के बालक जब सीखने लग जाते हैं तब उनमें परिश्रम की भावना या गुण उत्पन्न या विकसित होना प्रारम्भ होता है। इस गुण के विकास में इस बालक के साथी, पड़ौसी और शिक्षक प्रोत्साहन देते हैं या इनसे प्रोत्साहन मिलता है।
- इस अवस्था के बालक को सामाजिक और सांस्कृतिक नियमों को सीखने के लिए साथी बच्चों, पड़ोसियों और शिक्षकों आदि से प्रेरणा नहीं मिलती है, तो वह इनको सीखने में असफल रहता है। इस असफलता के कारण बालक में हीनता, असामर्थ्यता की भावना या व्यवहार विशेषता का विकास होना प्रारम्भ होता है। जब इस अवस्था के बालक में हीनता की भावना का विकास हो जाता है, तब वह अपनी क्षमता में विश्वास खो चुका होता है।
(5) किशोरावस्था : अहं पहचान बनाम भूमिका द्वन्द्व
- यह अवस्था 13 वर्ष से लेकर 18 वर्ष तक चलती है। इस अवस्था में किशोर अन्य लोगों के बीच में अपने अहं की पहचान करना सीखता है। यह उसके मनोसामाजिक पहलू
- इस अवस्था का किशोर जब अहं पहचान बनाम भूमिका द्वन्द्व से उतपन्न संघर्षों का समाधान करना धीरे-धीरे सीख लेता है, तो सफल समाधान के फलस्वरूप इसमें एक विशिष्ट मनोसामाजिक शक्ति का विकास प्रारम्भ होता है, जिसे कर्तव्यनिष्ठता कहते हैं। कर्तव्यनिष्ठता का अर्थ है समाज और संस्कृति की मान्यताओं के अनुसार उसमें शिष्टाचार और व्यवहार करने की क्षमता का विकसित होना।
(6) तरुणावस्था : घनिष्ठता बनाम लगाव
- यह अवस्था 19 वर्ष से लेकर 35 वर्ष तक की अवस्था है। इस अवस्था के प्रारम्भिक काल में व्यक्ति विवाह करके पारिवारिक जीवन में प्रवेश करते हैं। वे स्वतन्त्र जीविका अर्जन प्रारम्भ करते हैं। इसके लिए वे किसी न किसी व्यवसाय में लगते हैं। वास्तव में यह वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति अपना वास्तविक जीवन प्रारम्भ करता है। वह इस अवस्था में दूसरे लोगों से घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करता है, सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करता है और वह लैंगिक सम्बन्ध स्थापित करता है। इस अवस्था के व्यक्ति अपने भाई-बहिन, माता-पिता, मित्रों और सगे-सम्बन्धियों से घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करता है। अपनी पत्नी के साथ लैंगिक सम्बन्ध स्थापित करता है तथा वह इन सबसे और अनेक परिचित और अपरिचित लोगों से सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करता है। इस प्रकार के घनिष्ठ सम्बन्धों के कारण व्यक्ति के व्यक्तित्व का स्वस्थ विकास होता है।
- तरुणावस्था में व्यक्ति जब घनिष्ठ संबंध अपने परिवारजनों, सगे-सम्बन्धियों, मित्रो और परिचितों से स्थापित नहीं कर पाता है, तब वह व्यक्ति अपने आप में खोया-खोया सा रहता है। इसे एरिक्सन ने अलगाव कहा है। इस प्रकार के व्यक्ति दूसरों से जो भी अन्तर्वैयक्तिक सम्बन्ध स्थापित करते हैं, वे सतही होते हैं। जिन व्यक्तियों में अलगाव की प्रवृत्ति होती है, वे अपने व्यवसाय और धन्धों को नीरस समझते हैं। उनमें व्यर्थता की भी अनुभूति होती है। इस प्रकार के अलगाव वाले व्यक्तियों में जब अधिक मात्रा में अलगाव की प्रवृत्ति होती है, तब इनका व्यवहार समाज विरोधी हो जाता है। भविष्य में इस प्रवृत्ति के अधिक और सतत् रहने से मानसिक रोगों के होने की सम्भावना बढ़ जाती है।
(7) मध्य वयस्कावस्था उत्पादकता बनाम निष्क्रियता या स्थिरता
- यह अवस्था 36 से 55 वर्ष की अवस्था है। इस अवस्था के धनात्मक पक्ष में व्यक्ति में उत्पादकता की भावनाएँ और व्यक्तित्व लक्षण उत्पन्न होते हैं। उत्पादकता के कारण उसमें अपनी अगली पीढ़ी के लिए कल्याण की भावना उत्पन्न और विकसित होती है। इसके अन्तर्गत वह अगली पीढ़ी की देखभाल करता है और उसे विकसित और उन्नत बनाने की कोशिश करता है।
- जब इस अवस्था के व्यक्ति में उत्पादकता और सृजनात्मकता के भाव उत्पन्न होते हैं तब इस अवस्था के व्यक्ति में ऋणात्मकता पक्ष उत्पन्न और विकसित होना प्रारम्भ हो जाता है। यह ऋणात्मक भाव स्थिरता या निष्क्रियता है। इस गुण या भाव की उपस्थिति में व्यक्ति में आत्म-तल्लीनता की विशेषता पाई जाती है। इस विशेषता की उपस्थिति में व्यक्ति अपनी वैयक्तिक आवश्यकताओं को महत्व देता है। वह अपनी सुख-सुविधाओं को भी महत्व देता है। इस प्रकार के व्यक्ति दूसरों की चिन्ता न करने वाले होते हैं। यह अपनी सुख-सुविधा पसन्द करने वाले व्यक्ति होते हैं।
(8) परिपक्वता: अहं सत्यनिष्ठा बनाम नैराश्य या निराशा
- यह वह अवस्था है जो 55 वर्ष की आयु से प्रारम्भ होकर मृत्यु तक चलने वाली है। इस अवस्था को बुढ़ापे की अवस्था भी कह सकते हैं। इस अवस्था के व्यक्ति के सामने अनेक प्रकार की चुनौतियाँ होती हैं। व्यक्ति शारीरिक रूप से धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है। शारीरिक कमजोरी के साथ-साथ उसमें धीरे-धीरे मानसिक कमजोरी भी आने लगती है। इसी अवस्था में वह सेवा से सेवानिवृत्त जाता है, जिससे उसकी आय कम हो जाती है। इस अवस्था में वैवाहिक साथी की मृत्यु भी हो जाती है। इस प्रकार की जितनी भी चुनौतियाँ व्यक्ति के सामने आती हैं, व्यक्ति को इन सभी चुनौतियाँ का सामना और इन परिस्थितियों के साथ समायोजन करना पड़ता है। कभी-कभी वह इस अवस्था में अपने पिछले जीवन की असफलताओं को याद करके अपना मूल्यांकन करता है। यदि व्यक्ति पिछली तमाम अवस्थाओं के जीवन से सन्तुष्ट है तब इस प्रकार के व्यक्ति में अहं पूर्णता या अहं सत्यनिष्ठा की भावना और गुण उत्पन्न होता है। अहं पूर्णता के भाव की उपस्थिति में व्यक्ति की मृत्यु का भय नहीं लगता है। व्यक्ति इस अवस्था में अपनी सार्वजनिक उपलब्धियों के सहारे अपना शेष जीवन व्यतीत करता है। यह भी हो सकता है कि व्यक्ति अपनी पूर्व की अवस्थाओं के जीवन के आधार पर जो मूल्यांकन करता है उसके आधार पर वह अपना ऋणात्मक मूल्यांकन करे। ऋणात्मक मूल्यांकन के कारण उसमें निराशा नैराश्य की भावना विकसित होती है।