फ्रायड का व्यक्तित्व विकास सिद्धान्त (Freud's Theory of Personality Development)

Admin
0

फ्रायड का व्यक्तित्व विकास सिद्धान्त 
(Freud's Theory of Personality Development)
फ्रायड का व्यक्तित्व विकास सिद्धान्त   (Freud's Theory of Personality Development)


 

फ्रायड का व्यक्तित्व विकास सिद्धान्त

I. व्यक्तित्व संगठन के संरचना सम्बन्धी स्तर 

फ्रायड के अनुसार व्यक्तित्व संगठन के तीन स्तर होते हैं। यह तीनों स्तर मिलकर एकीकृत तथा सामंजस्यपूर्ण व्यक्तित्व संगठन का निर्माण करते हैं और व्यक्ति को अपने वातावरण में सन्तोषजनक समायोजन करने योग्य बनाते हैं। यदि तीनों स्तर या संस्थान एक सामंजस्यपूर्ण इकाई नहीं बनाते हैंतो कुसमायोजन हो जाता है।

 

व्यक्तित्व के यह तीन स्तर निम्न प्रकार हैं- 

1. इड (Id)-

फ्रायड का मानना हैयह वह स्तर है जिसमें वह सब होता हैजो जन्मजात है। यह मानव संरचना में निश्चित होता है। समस्त मानसिक शक्ति का स्त्रोत यहीं है। यह प्राणी को आराम की अवस्था में रखता है। यह सुख की खोज करता है और दुःख से बचता है। यह नैतिकतामूल्यों या तर्क से नियन्त्रित नहीं होताहै। इसकी शक्ति या तुरन्तकालीन कार्यों में या कामनाओं की पूर्ति के ख्याल में व्यय होती है अथवा अहम् के अधिकार में आती है।

 

2. अहम् (Ego)-

प्राणी को यथार्थता तथा प्रतिमाओं में भेद करना चाहिए। ऐसा करने के लिए इड का एक भाग विशेष रूप से विकसित होता है और इड तथा बाहरी संसार के बीच एक माध्यम बन जाता है। यही अहम् होता है। इसका मुख्य कार्य झ्ड तथा अत्यहम् को नियन्त्रण करना तथा वातावरण में सामंजस्यपूर्ण सम्बन्ध बनाये रखना है।

 

3. अत्यहम् (Super Ego)- 

फ्रायड का मानना है कि बालकों की अपने अभिभावकों पर निर्भरता उनके अहम् पर एक स्थायी छाप छोड़ देती है। यह इस प्रकार होता है कि जैसे कोई विशेष संस्थान अहं के अन्दर बन गया होजिसमें अभिभावकों का प्रभाव जीवित रहता है। इसको ही अत्यहम् कहा जाता है। यह समाज के पारस्परिक मूल्यों एवं विचारों का आन्तरिक प्रतिनिधि हैजो बालक पर उसके माता-पिता द्वारा आरोपित किए जाते हैं। यह आदर्श को प्रस्तुत करता है और इसका उद्देश्य है परिपूर्णतान कि आनन्द। माता-पिता पुरस्कार तथा सजा के द्वारा अत्यहम् के विकास को रूप देते हैं। 

इदम् तथा अत्यहम् दोनों पूर्वकाल को प्रस्तुत करते हैं जबकि अहम् वर्तमान की ओर प्रतिक्रियाशील होता है। अहम् का निर्माण इड से होता है और अत्यहम् का अहम् से और यह व्यक्ति के जीवनभर आपस में अन्तःक्रिया करते रहते हैं। व्यक्तित्व एक इकाई के रूप में ही कार्य करता है किन्तु इड व्यक्तित्व का जैविक तत्व है। अहम् मनोवैज्ञानिक भाग है और अत्यहम् सामाजिक संघटक है।

 

11. विकास की क्रिया में काम सम्बन्धी स्तर 

फ्रायड ने अपने सिद्धान्त में एक बालक की काम शक्ति या बाल्यकालीन कामुकता की भी कल्पना की है। फ्रायड का मानना है कि यह काम शक्ति बालक में जीवन के प्रारम्भसे ही होती है। इस काम शक्ति को फ्रायड ने अपने सिद्धान्त में लिबिडो कहा है। यह शक्ति व्यक्ति को जीवनपर्यन्त सक्रिय बनाए रखने में मदद करती है। बालक में काम शक्ति का प्रदर्शन भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में भिन्न-भिन्न रूपों द्वारा होता है। लिबिडो का मुख्य कार्य लैंगिक सन्तुष्टि के लिए बालक को प्रेरित करना और सुख के प्रति झुकाव उत्पन्न करना है। फ्रायड का मानना है कि विकास में मनोलैंगिक कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ये मनोलैगिक कारक व्यक्ति के विकास को जीवनपर्यन्त प्रभावित करते हैं। फ्रायड द्वारा मनोलैंगिक कारकों की अवस्थाओं के आधार पर विवेचना की गई है। इन अवस्थाओं को विकास की मनोलैंगिक अवस्थायें कहा जाता है। 


फ्रायड द्वारा विकास का वर्णन पाँच मनोलैंगिक अवस्थाओं की सहायता से किया गया है। ये अवस्थाएँ सापेक्षिक रूप से एक-दूसरे से भिन्न हैंलेकिन एक-दूसरे से अस्थायी रूप से Overlap करती. हैं। ये अवस्थाएँ निम्नलिखित हैं-

 

1. मुखीय अवस्था (Oral Stage) 

इस अवस्था को दो भागों में बाँटा गया है- (क) मुखीय चूषण अवस्था तथा (ख) मुखीय दंशन (काटना) अवस्था। मुखीय अवस्था जन्म से लेकर 18 माह तक की अवस्था है। इस अवस्था को मुखीय अवस्था इसलिए कहा गया है क्योंकि इसमें यौन-तृप्ति का केन्द्र मुख है। नवजात शिशु का मन पूर्णतः अचेतन और इड से पूर्ण होता है। इस अवस्था में चूसना पोषण का एक साधन ही नहीं होता हैबल्कि एक सुखद अनुभूति होती है। यही कारण है कि पेट भर जाने के बाद भी बच्चा स्तनपान करता रहता है।

 

(i) मुखीय चूषण अवस्था (Oral Suking Stage) - 

  • यह अवस्था जन्म से लेकर आठ माह तक की अवस्था है। इस अवस्था में बालक सुख की अनुभूति माँ के स्तनपान द्वारा करता है। फ्रायड के अनुसार बालक को काम शक्ति की सन्तुष्टि मुखहोंठजीभ द्वारा चूसने से अथवा निगलने की क्रिया से प्राप्त होती है। इस अवस्था में बालक का सम्पूर्ण शरीर इड का बना होता है। इस अवस्था में बालक का सम्पूर्ण शरीर संवेदनशील होता है। बालक के शरीर के किसी भी अंग को कहीं से भी स्पर्श किया जाएउसे इस प्रकार का स्पर्श प्रिय लगता है। जब बालक को दूध स्तनपान के अतिरिक्त अन्य तरीकों से दिया जाता है तो उसे काम सन्तुष्टि नहीं होती है।

 

(ii) मुखीय दंशन अवस्था (Oral Biting Stage) - 

  • यह छः माह से अठारह माह तक की अवस्था है। दाँत लगभग छः माह तक की अवस्था से निकलना प्रारम्भ हो जाता है। दाँत निकलने पर बच्चा आक्रामक व्यवहार प्रदर्शित कर सकता है। इस अवस्था में उसकी काम शक्ति का क्षेत्र दाँत और जबड़े होते हैं। इस अवस्था में इससे पूर्व की अवस्था की भी विशेषताएँ बनी रहती हैं। इस अवस्था में बालक को आनन्द की अनुभूति तीन प्रकार से होती है-काटने द्वाराचूसने द्वारा तथा निगलने द्वारा।

 

  • बालक का माँ के प्रति व्यवहार उभयवादी होता है। एक ओर तो बालक अपनी माँ को प्रेम करता है क्योंकि माँ से उसे उसकी इच्छाओं की सन्तुष्टि होती है। दूसरी ओर वह अपनी माँ से घृणा भी करता है। इस अवस्था में बालक का माँ के प्रति घृणा का कारण सम्भवतया माँ का बालक की ओर अधिक ध्यान न दे पाना है। यह पहले बताया जा चुका है कि मुखीय चूषण अवस्था में बालक स्वकामुक होता हैपरन्तु स्वकामुकता के प्रति बालक में चेतना नहीं होती है। इस अवस्था में बालक को अपने शरीर में कामुकता के सुख की प्राप्ति होती है और इस सुख प्राप्ति के प्रति व जागरूक भी होता है।

 

  • लगभग डेढ़ वर्ष की अवस्था पर बालक को सफाई की आदतें सिखाई जाती हैं। कई बार इस अवस्था के अन्त तक दूसरा बच्चा पैदा हो जाता है। नए बालक से पहला बालक ईर्ष्या करने लगता हैक्योंकि माता-पिता का ध्यान इस नए बालक की ओर केन्द्रित हो जाता है। जितना स्नेह इस नए बालक को मिलता हैउतना पहले वाले बालक को प्राप्त नहीं होता है। इस डेढ़ वर्ष के बालक को अपने द्वन्द्वों के बीच रहना पड़ता है।

 

2. गुदीय अवस्था (Anal Stage) 

इस अवस्था को दो भागों में बाँटा गया है- 

(क) गुदा निष्कासन अवस्था और (ख) गुदा अवधारण अवस्था। 

यह सम्पूर्ण अवस्था आठ माह से चार वर्ष तक की अवस्था है। इस अवस्था के बालक को कामुक सुख का अनुभव मल-विसर्जन प्रक्रिया से प्राप्त होता है।

 

(i) गुदा निष्कासन अवस्था (Anal Expulsive Stage)- 

  • यह आठ माह से तीन वर्ष तक की अवस्था है। कामुक सुख की बालक को प्राप्ति मल-मूत्र निष्कासित से होती है तथा Libidinal Localization गुदा तथा नितम्बों पर होती है। घर में बालक को मल-मूत्र त्याग और सफाई की आदतें सिखाई जाने लगती हैं। सुबह उठते ही बालक को शौचालय मल-मूत्र त्याग के लिए भेजा जाता है। अक्सर उसे मल-मूत्र त्याग का महत्व भी समझाया जाता है। कई बार वालकों को जहाँ मल-मूत्र त्याग करना मना होता हैवहीं पर वह यह क्रिया करके अपनी आक्रामकता की अभिव्यक्ति करते हैं। फ्रायड का विचार है कि बालक को सोते में बिस्तर पर पेशाब करना भी उसकी आक्रामकता की अभिव्यक्ति है। निर्धारित स्थान और निश्चित समय पर बालक को मल-मूत्र त्याग का बन्धन पसन्द नहीं होता है। धीरे-धीरे बालक को अपने को वास्तविकता के अनुरूप बनाना होता है।

 

(ii) गुदा अवधारणा अवस्था (Anal Retentive Stage) - 

  • यह अवस्था एक वर्ष से चार वर्ष तक की अवस्था है। इस अवस्था में बालक अपने मल-मूत्र को रोकने के सामाजिक महत्व को सीखता है। मल-मूत्र रोकने में उसे कुछ परिस्थितियों में तो आनन्द की प्राप्ति होती है तथा कुछ परिस्थितियों में उसकी बदनामी उस समय हो जाती है जब उसका मल-मूत्र उसकी इच्छा के विरुद्ध निकल जाता है। यह बालक के लिए एक बड़ा संवेगात्मक आघातपूर्ण अनुभव है। लगभग चार वर्ष की अवस्था का बालक स्वच्छता का ध्यान रखने लग जाता है। उसको इस अवस्था से वातावरण की वास्तविकता और सामाजिक प्रतिबन्धों का ज्ञान होने लगता है और इस ज्ञान के साथ-साथ उसकी अत्यहम् का विकास होने लग जाता है। 
  • इस अवस्था में बालक की यौन सन्तुष्टि में डाली गयी अनावश्यक बाधा बालक में अनेक महत्वपूर्ण मानसिक रोगों के लक्षण उत्पन्न कर सकती है। उदाहरण के लिएवह पैरानोइया या कम्पल्सिव न्यूरोसिस का रोगी हो सकता है या चरित्र दोष उत्पन्न हो सकते हैं। 
  • समलिंगी कामुकता भी उत्पन्न हो सकतीं है। इस अवस्था की क्रियाएँ आगे के जीवन में बदले हुए रूप में चल सकती हैं। कब्जपेचिशप्रतिदिन क मल-मूत्र क्रिया में रुचिफैशन साहित्य-और गुदा सम्बन्धी कहानियों में बालक रुचि ले सकता है।

 

3. लैंगिक अवस्था (Phallic Stage) 

  • यह अवस्था तीन वर्ष से सात वर्ष तक की अवस्था है। इससे पहले वाली अवस्था में ही बच्चों को लिंग के अन्तर का ज्ञान हो जाता है। बालक अपने भाई-बहिनों को ही नंगा नहीं देखता बल्कि कभी-कभी वह इस अवस्था में अपने माता-पिता को भी देखता है। वह अपने माता-पिता को शारीरिक सम्बन्ध बनाते हुए भी देख संकता है। यदि इस प्रकार भी बालक को सैक्स के अन्तर का ज्ञान नहीं होता हैतब तब उसे उस समय इसकी अनुभूति होती हैजय बालक को गुब्बारेमिठाई या किसी अन्य चीज के बहाने कमरे से बाहर निकाला जाता है। 

  • इन परिस्थितियों में बालक यह कल्पना कर लेते हैं कि माता-पिता जरूर कोई मजेदार प्रोग्राम हमें बाहर निकालकर मनाते हैं। इस अवस्था में बालक अपने गुप्तांगों या जननेन्द्रियों से तीन प्रकार से सुख प्राप्त करते हैं- (1) छूने द्वारा, (2) सहलाकर या खेलकर, (3) प्रदर्शन द्वारा। वह इस प्रकार का आनन्द अपनी ही ज्ञान इन्द्रियों से प्राप्त नहीं करते वल्कि दूसरे साथी लड़के-लड़कियों की जननेन्द्रियों के साथ भी खेलते हैं।

 

  • वन्ध्यकरण चिन्ता भी बालकों में इस अवस्था में उत्पन्न हो जाती है। यह वह चिन्ता है जो उस समय उत्पन्न होती है जब बालक को उसकी जननेन्द्री को काटने या हटाने की चेतावनी दी जाती हैं। उदाहरण के लिएबालक जब इस अवस्था में अक्सर अपनी जननेन्द्री को छूता रहता हैतब पहले तो उसे इस प्रकार का मना किया जाता है कि उसको छूना गन्दी बात है। जब इस प्रकार बालक नहीं मानता हैतब उसे यह चेतावनी देनी पड़ती है कि आपने यदि अपनी यह जननेन्द्री छुई तो इसे काट दिया जाएगा।

 

  • इस अवस्था में दमित अपराध भावनाएँ अनेक मानसिक रोगों के लक्षण उत्पन्न कर सकती हैं। दमित भावनाओं के कारण हिस्टीरिया और चिन्ता मनस्ताप जैसे मानसिक रोग उत्पन्न हो सकते हैं। हस्तमैथुननार्सिसीयतादुलारनागन्द्रे मजाक तथा नृत्य निरन्तरण के प्रतीक हैं। इस अवस्था की भावनाओं का यदि उदात्तीकरंण हो तो व्यक्ति कविता प्रेमअभिनय और पुनीत प्रेम की ओर उन्मुख हो सकता है। इसी प्रकार प्रतिक्रियात्मक व्यवहार के उत्पन्न होने पर व्यक्ति सैक्स के प्रति कठोर रुख अपना सकता है और स्वभाव में लज्जा और विनम्रता उत्पन्न हो सकती है।

 

4. सुप्तावस्था (Latency Stage) 

  • यह अवस्था 6 वर्ष से 12 वर्ष या किशोरावस्था के प्रारम्भ तक की अवस्था है। यह अवस्था सुप्तावस्था इसीलिए कहलाती है क्योंकि इस अवस्था में शैशवकालीन कामुकता शान्त या गुप्त रहती हैपरन्तु समाप्त नहीं होती है। वालक कामुक इच्छाओं का उदात्तीकरण करता है। उदात्तीकरण और प्रतिक्रिया निर्माण मानसिक मनोरचनाओं के कारण बालक के सभी व्यवहार समाज की मान्यताओं के अनुसार परिवर्तित हो जाते हैं। इस अवस्था में वह धार्मिक विचारों की ओर उन्मुख होता है तथा एक अच्छे स्काउट की भाँति आदर्श व्यवहार का प्रयास करता है। इस अवस्था की लड़कियाँ लड़कों की अपेक्षा अधिक स्नेहयुक्त लगती हैं।

 

5. जननेन्द्रीय अवस्था (Genital Stage) 

  • यह अवस्था किशोरावस्था या 12 वर्ष की आयु से 20 वर्ष की आयु तक की अवस्था है। इस अवस्था में कामुकता एक बार फिर से जाग्रत होती है। इस अवस्था में यौन अंगों का विकास पूर्णता की ओर अग्रसर होता है। विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण और रुचि उत्पन्न होती है। इस अवस्था में लड़के-लड़कियाँ हस्तमैथुनसमलैंगिकतानींद में मैथुन कल्पनातथा मनगढ़न्त सेक्स कहानियों में खूब रुचि लेते हैं। किशोर चुम्बन जैसी कामुक क्रियाओं को समझने और करने लग जाते हैं। समलिंगी कामुकता का कारण लड़के-लड़कियों के मिलने पर लगा सामाजिक प्रतिबन्ध है। इस अवस्था के लड़के-लड़कियाँ जब अकेले में होते हैं तो पराजित-सा अनुभव करते हैं। इस पराजय का अनुभव मिटाने के लिए किशोर-किशोरियाँ हस्तमैथुन करते हैं। लड़कियाँ अपनी आतंक जमाने की प्रवृत्ति छोड़कर लज्जा का सहारा लेती हैइस अवस्था में संकोच की प्रवृत्ति भी जाग्रत होती है। बहुधा इस अवस्था के अन्त तक समलिंगी कामुकता छूट जाती है।

 

  • इस प्रकार हम कह सकते हैं कि फ्रायड द्वारा विकास के सम्बन्ध में व्यापक सिद्धान्त की रचना की गई है। अनेकमनोवैज्ञानिक अध्ययनों द्वारा भी प्रमाणित हो चुका है कि जीवन के प्रारम्भिक अनुभव व्यक्ति के विकास को महत्वपूर्ण ढंग से प्रभावित करते हैं। फ्रायड द्वारा अपने सिद्धान्त में लिंग शब्द का उपयोग अत्यन्त व्यापक अर्थो में किया गया हैइसलिए फ्रायड को कुछ लोग गंदे दिमाग का व्यक्ति भी कहते हैं।

Post a Comment

0 Comments
Post a Comment (0)

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !
To Top