सामाजिक
सिद्धान्त एवं लैंगिक विकास (Social Theory and Gender Development)
लिंग भूमिकाओं का अर्थ (Meaning of Gender Roles)
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार
"व्यवहार तथा गतिविधियों से ही सामाजिक रूप से लिंग भूमिकाओं का निर्माण होता है। एक समाज पुरुषों और महिलाओं के लिए जो उचित समझता है, उसी को जिम्मेदार बताता है।"
- यद्यपि प्रत्येक लिंग अपनी भूमिकाओं का निर्माण करने के लिए जो कुछ भी कर रहे हैं, वह किस हद तक उचित है? और किस हद तक उनकी भूमिकाओं का सामाजिक रूप से निर्माण हो रहा है यह नहीं कहा जा सकता है।
- लिंग भूमिकाएँ सांस्कृतिक रूप से भी विशिष्ट होती हैं और यदि देखा जाए तो संस्कृतियों के आधार पर केवल लिंग के दो भेद हैं-लड़का और लड़की। एन्ड्रोगाइनी एक तीसरे लिंग के रूप में प्रस्तावित किया गया है। कुछ समाजों में पाँच से अधिक लिंग होने का दावा किया गया है और कुछ गैर पश्चिमी समाजों में तीन लिंग होने का दावा किया गया है-आदमी, औरत और तीसरे लिंग।
- लिंग भूमिका के वर्गीकरण के अनुसार प्रत्येक लिंग से कुछ सांस्कृतिक उम्मीदें होती हैं। इनसे भ्रमित नहीं होना चाहिए क्योंकि इन्हीं सांस्कृतिक उम्मीदों से किसी लिंग की पहचान होती है। सांस्कृतिक उम्मीदों के अनुसार ही सामाजिक मानदण्ड निर्धारित होते हैं। लिंग भूमिकाएँ आमतौर पर व्यवहार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को प्रतिबन्धित करती है। लिंग भूमिका का प्रयोग एक संस्था के रूप में एक अपमानजनक अर्थ में सन्दर्भित कर रहे हैं। इसका प्रमुख कारण सामान्य तौर पर लिंग भूमिका करने के लिए सामान्य परतन्त्रता की भावना है। कई राष्ट्रों की महिलाओं से लिंग के आधार पर इतना भेदभाव किया जाता है कि उन्हें मतदान के अधिकार से भी वंचित रखा गया। 19वीं तथा 20वीं शताब्दी तक दुनिया के कई हिस्सों में महिलाओं को मतदान का अधिकार नहीं दिया गया। 21वीं शताब्दी में कुछ राष्ट्रों में महिलाओं को पूर्ण स्वतन्त्रता तथा सुरक्षा का अधिकार दिया गया। समाज में कुछ ऐसे समूह भी विद्यमान हैं जो सामाजिक तथा स्थापित मानदण्डों के अनुरूप नहीं हैं और नकारात्मक रूप से लिंग भूमिकाएँ कर रहे हैं। यह तो तय है कि समलैंगिक के रूप में लिंग भूमिकाओं के मानक पश्चिमी गर्भाधान के अनुरूप नहीं है। समलैंगिकों की दुर्दशा लिंग भूमिकाओं के सन्दर्भमें ही है।
- इसके बावजूद कुछ व्यक्तियों के लिए लिंग भूमिकाएँ एक सकारात्मक प्रभाव प्रदान कर सकती हैं। कई लिंग भूमिकाएँ हानिकारक लिंग के लिए लकीर के फकीर हो सकती हैं, इस तथ्य के बावजूद लिंग भूमिकाओं को एक सामाजिक संरचना के रूप में स्वीकार कर लिया गया है और लिंग के व्यवहार को आत्मसम्मान में वृद्धि के साथ जोड़ा गया है। निर्धारित लिंग, भूमिकाओं को पूरा करने को आत्म-सन्तुष्टि के रूप में देखा जाता है, जो निर्धारित लिंग भूमिकाओं के अनुरूप आत्म-सन्तुष्ट नहीं हैं, वे तटस्थ लिंग के रूप मे पहचाने जाते हैं। वे स्वयं को समाज से अपने को अलग अनुभव करते हैं और उन्हें ऐसा भी प्रतीत होता है कि वे सामान्य नहीं हैं और उनका व्यवहार समाज के निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं हैं।
लिंग भूमिकाओं को
प्रभावित करने वाले कारक (तत्व)
(Factors Influencing
Gender Roles)
1. हारमोनल कारक
- जैविक कारक बच्चों के शारीरिक विकास को आकार प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते हैं। उदाहरण के लिए, लड़कें एवं लड़कियाँ लैंगिक अंगों के साथ जन्म के साथ ही भिन्नता लिए हुए उत्पन्न होते हैं और जन्म के बाद भी उनकी यह भिन्नता बनी रहती है। परिपक्वावस्था पर उनमें दूसरे लिंग की विशेषताएँ उत्पन्न होती हैं। प्राकृतिक रूप से शरीर में कुछ रासायनिक कम्पाउण्ड होते हैं, जिन्हें हम हारमोन कहते हैं, वे ही शारीरिक भिन्नता के लिए उत्तरदायी होते हैं।
- कुछ मनोवैज्ञानिकों ने अध्ययनों के आधार पर यह कहा है कि समलिंगी हारमोन लैंगिक अंगों में भिन्नता दिखाने में असमर्थ होता है और यह हारमोन लगभग परिपक्वता काल में उत्पन्न होता है और इसका लिंग पहचान आकार में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लड़कों में एनड्रोगेन लड़कियों की अपेक्षा अधिक होता है। कुछ लड़के एवं लड़कियाँ ऐसी परिस्थितियों में जन्म लेते हैं, जिसे कनजेनीटल एड्रीनल हाइपरप्लासिया कहा जाता है, जिससे उच्च स्तर पर एन्ड्रोगेन हारमोन उत्पन्न होता है और वे अपने सहपाठियों से प्रभावित नहीं होते हैं। जो लड़के अधिक एन्ड्रोगेन रखते हैं। वे पुरुष साथियों से सामान्य व्यवहार करते हैं और उनके साथ खेलते हैं और जिन लड़कियों में एन्ड्रोगेन का स्तर उच्च होता है। वे अधिक लिंग रूढ़ियों से ग्रसित पुरुषों के लक्षण वाली होती हैं और वे अपनी समआयु की सहपाठियों से अधिक सम्बन्धित होती हैं, जो लड़कियाँ सी.एच. के साथ अतिरिक्त जेनीटलिया के साथ जन्म लेती हैं वे पुरुषों की भाँति दिखाई देती है। वैसे तो वे लड़कियाँ ही होती हैं, परन्तु इन बालिकाओं में पुरुष जननांग दिखाई देता है।
2. सामाजिक एवं पर्यावरणीय कारक (Social and Envionmental Factors)-
- बहुत से अध्ययन यह प्रदर्शित करते हैं कि लिंग पहचान के विकास में बच्चों का पालन-पोषण एवं सामाजिक वातावरण का भी प्रभाव पड़ता है। इस बात को बच्चों की रुचि, महत्व, व्यवहार, उनकी पूर्ण सोच मध्यावस्था की पूर्व अवस्था में उन्हें दी गयी शिक्षा, उनके माता-पिता द्वारा दिया गया या ऐसा व्यक्तित्व जिससे वे प्रभावित होते हैं तथा शिक्षा पर निर्भर करता है।
- बच्चे निरीक्षण एवं अनुकरण के द्वारा वे सब सीखते हैं, जो उनके प्राथमिक संरक्षक (माता-पिता) करते हैं, वे उन सबकी नकल करते हैं और आत्मसात करते हैं, जो वे देखते हैं और तब वे उसे अपने जीवन में उसी तरह दोहराते हैं। इस प्रकार वे आत्मनिर्भर वनते हैं। बच्चे अपने माता-पिता को देखते हुए बड़े होते हैं और अपनी परम्परागत लिंग सम्बन्धी भूमिकाओं को निभाते हैं। सामान्य तौर पर वे प्रौढ़ होने पर भी वैसी ही भूमिका निभाते हैं, जो उनके साथियों के माता-पिता द्वारा निभायी जाती हैं, जो अपेक्षाकृत कम परम्परागत होते हैं।
3. समलैंगिक, उभयलिंग एवं सम्मोहित लैंगिक युवा (Homosexual, Bisexual and Trans-geneated Youth)-
- जैविक एवं सामाजिक परिस्थितियाँ बताती हैं कि अधिकांश लड़के प्राथमिक तौर पर पुरुष लिग के पहचान के साथ विकसित होते हैं और अधिकतर लड़कियाँ प्राथमिक तौर पर स्त्रियोचित लिंग पहचान के साथ विकसित होती हैं। उनका रूढ़िगत व्यवहारों के कारण उनका व्यवहार बचपन से ही उनके अनुभवों के आधार पर परिवर्तित हो सकता है। यह आवश्यक है कि वे अपने लिंग के साथ में आराम अनुभव करें और कम से कम तनाव अनुभव करें। उन्हें अपनी लैंगिक पहचान प्राकृतिक और सामान्य तौर पर स्वीकार करनी चाहिए। यह सोचना आवश्यक है कि वे सामाजिक और लैंगिक रूप से क्या करना चाहते हैं और वे जो करना चाहते हैं। उसका प्रभाव उनके परिवार तथा समाज पर क्या पड़ेगा? क्या परिवार और समाज उन्हें इस रूप में स्वीकार करेगा? उन्हें यह नहीं पता होता है कि जो वे नहीं हैं उसे दिखाने में वे कभी भी आत्मविश्वासी नहीं रह सकते हैं।
- सामान्य परिस्थितियों में किशोर अधिकतर विपरीत यौन के साथियों की ओर लैंगिक क्रियाओं के लिए आकर्षित होते हैं। सम्मोहित युवा अधिकतर विपरीत लिंग पहचान के साथ विकसित होते हैं। वे शारीरिक रूप से पुरुष हो सकते हैं, परन्तु वे आन्तरिक रूप से अपने आपको महिला समझते हैं, या वे शारीरिक रूप से महिला हो सकते हैं, लेकिन वे अपने आपको पुरुष अनुभव करते हैं। ऐसे लोगों को ही भविष्य में गे, लेसवियन, उभयलिंगी, क्वशनिंग, इण्टरसेक्स तथा ट्रान्सजनरेटिड बच्चे कहा जाता है।
(अ) लिंग भूमिका
एवं रूढ़िगत अवधारणाएँ (Stereotypes)
- प्रत्येक लिग से समाज की कुछ अपेक्षाएँ होती हैं, जिन्हें उस लिंग के व्यक्ति को पूरा करना पड़ता है। स्त्री हो अथवा पुरुष सभी से समाज की अपेक्षाओं के अनुरूप व्यवहार की आशा की जाती है, किन्तु साथ ही समाज की कुछ रूढ़िगत धारणाएँ भी प्रत्येक लिंग से जुड़ी होती हैं। जैसे पुरुष घर का वारिस होता है। पिता का पिण्डदान बेटा ही करता है, पुरुष घर का कर्ताधर्ता होता है। महिला पुरुष के अधीन होती हैं। महिलाओं को पुरुष की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए तथा महिलाओं को अपने घर तथा परिवार को ही अपनी सारी दुनिया समझना चाहिए। महिलाओं से वंश नहीं चलता, स्वर्ग प्राप्ति के लिए बेटा होना आवश्यक है, जो पुरुष स्त्रियोचित व्यवहार करते हैं, उनमे जेनेटिक प्राब्लम होती है तथा उनमें प्रजनन क्षमता नहीं होती है। समलिंगी पुरुष घृणा के पात्र हैं आदि, इसी प्रकार की अनेकों रूदिप्रद भावनाएँ प्रत्येक लिंग भूमिका के साथ जुड़ी होती हैं, साथ ही समाज के अनुरूप आचरण न करने वाले लिंग की सामाजिक प्रतिष्ठा का स्तर निम्न माना जाता है। समाज की आकांक्षाओं के अनुरूप व्यवहार करने वाले को ही समाज में सम्मान प्राप्त होता है। समलिंगी व्यक्ति के परिवार में होने पर परिवार को समाज के समक्ष शर्मिन्दगी उठानी पड़ती है, क्योंकि ऐसे सम्बन्धों को समाज स्वीकार नहीं करता है और न ही यह मानता हैं कि यह प्राकृतिक रूप से ऐसे हैं या जैविक रूप से हारमोन व्यवधान के कारण इनका इस प्रकार का व्यवहार है, बल्कि ऐसे व्यवहार वाले व्यक्तियों को समाज अपने में से एक नहीं मानता है, इसी कारण यदि परिवार में ऐसा कोई व्यक्ति होता है और परिवार को उसकी जानकारी होती भी है तो भी उसे समाज के सामने नहीं बताया जाता है।
(ब) लिंग भूमिका एवं खेल का मैदान (Gender Role and Playground)
- खेल के मैदान में भी लिंग भूमिका का विशेष महत्व होता है। पुरुषों से शक्ति की अधिकता वाले खेलों को खेलने की उम्मीद की जाती है। पुरुषों से जितनी अधिक शारीरिक बल वाले खेलों को खेलने की अपेक्षा रखी जाती है, उतनी वालिकाओं अथवा महिलाओं से नहीं। क्रिकेट, फुटबॉल, वेट लिफ्टिंग, मुक्केबाजी, कुश्ती, दौड़ आदि खेल खेलने की अपेक्षा पुरुषों से रखी जाती है। यदि कोई महिला इन खेलों को खेलने का प्रयास करती है तो समाज उसे स्वीकार नहीं करता है और कदम-कदम पर उसके समक्ष चुनौतियाँ उत्पन्न की जाती हैं। मेरीकॉम इसी प्रकार की महिला थी, जिसने पुरुषों के अधिकार क्षेत्र के खेल खेलने का प्रयास किया। यदि कोई वालिका इस प्रकार के खेल में रुचि लेती है तो उसे तत्काल यह जता दिया जाता है कि वह लड़की है और यह खेल पुरुषों के खेल हैं अतः उसे यह खेल नहीं खेलना चाहिए। इस प्रकार खेल के मैदान में भी लिंग भेद स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जो कि समाज की रूढ़िवादी धारणां तथा पूर्व धारणाओं पर आधारित सो को व्यक्त करता है।